AIR 263 · CSE 2016 · GS4 · 66 pages

Kanchan Kumar Kandpal: GS4 answer copy

18 answers by Kanchan Kumar Kandpal, as written in the test. Each question opens a page with how other toppers answered it.

The questions

  1. Q11. क्या इस अध्ययन में डॉ. सिंह की भागीदारी उचित है? अपना औचित्य सिद्ध कीजिए। 2. क्या डॉ. सिंह हितों के टकराव से जुड़े हैं? यदि हां, तो ऐसे टकराव की प्रकृति क्या है? इसका शमन कैसे किया जा सकता है। 3. यदि उनके नाम पहले से ही शेयर नहीं होते तथा उक्त अध्ययन के संचालन के एवज में शेयर का प्रस्ताव किया गया होता तो हितों के टकराव की प्रकृति किस प्रकार अलग होती?
  2. Q22. क्या डॉ. सिंह हितों के टकराव से जुड़े हैं? यदि हां, तो ऐसे टकराव की प्रकृति क्या है? इसका शमन कैसे किया जा सकता है।
  3. Q1420 marks

The answers

Question 1 · 343 words written

1. क्या इस अध्ययन में डॉ. सिंह की भागीदारी उचित है? अपना औचित्य सिद्ध कीजिए। 2. क्या डॉ. सिंह हितों के टकराव से जुड़े हैं? यदि हां, तो ऐसे टकराव की प्रकृति क्या है? इसका शमन कैसे किया जा सकता है। 3. यदि उनके नाम पहले से ही शेयर नहीं होते तथा उक्त अध्ययन के संचालन के एवज में शेयर का प्रस्ताव किया गया होता तो हितों के टकराव की प्रकृति किस प्रकार अलग होती?

Opening

यह मामला 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) का एक स्पष्ट उदाहरण है। डॉ. सिंह की भागीदारी के संबंध में विश्लेषण निम्न प्रकार है:

Body · points

1. डॉ. सिंह की भागीदारी का औचित्य: डॉ. सिंह की भागीदारी अनुचित है। यद्यपि वे 'प्रमुख अन्वेषक' के रूप में विशेषज्ञता प्रदान कर रहे हैं, किंतु उनका वित्तीय हित (शेयरधारक होना) और व्यावसायिक लाभ (रेफरल में वृद्धि) उनके वैज्ञानिक निर्णयों और रोगी की सुरक्षा के प्रति निष्पक्षता को प्रभावित कर सकते हैं। चिकित्सा नैतिकता (Medical Ethics) के अनुसार, शोधकर्ता को रोगी के हित को अपनी व्यक्तिगत लाभ की संभावना से ऊपर रखना चाहिए।

2. हितों के टकराव की प्रकृति एवं शमन: हाँ, डॉ. सिंह स्पष्ट रूप से 'हितों के टकराव' में हैं।

  • प्रकृति: यह एक 'वित्तीय और व्यक्तिगत हितों का टकराव' है। कंपनी से शेयर होने के कारण, उनकी आय कंपनी की सफलता (परीक्षण की सफलता) से सीधे जुड़ी है। साथ ही, रेफरल में वृद्धि से उनकी व्यावसायिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
  • शमन (Mitigation):
    • प्रकटीकरण (Disclosure): उन्हें तुरंत इस वित्तीय संबंध को शोध समिति और रोगियों के सामने प्रकट करना चाहिए।
    • निर्णय लेने की प्रक्रिया से अलगाव: उन्हें उन निर्णयों से दूर रहना चाहिए जो सीधे तौर पर परीक्षण के परिणामों या कंपनी की वित्तीय स्थिति को प्रभावित करते हैं।
    • स्वतंत्र निगरानी: एक स्वतंत्र ऑडिट समिति द्वारा शोध की निगरानी की जानी चाहिए।
    • पद त्याग: यदि टकराव का स्तर अधिक है, तो उन्हें इस परियोजना से हट जाना चाहिए।

3. यदि शेयर का प्रस्ताव बाद में किया गया होता: यदि उनके नाम पहले से शेयर नहीं होते और बाद में 'एवज' के रूप में शेयर का प्रस्ताव दिया जाता, तो हितों के टकराव की प्रकृति 'क्विड प्रो क्वो' (Quid Pro Quo) या 'लेन-देन आधारित रिश्वतखोरी' (Transactional Bribery) की होती।

  • यह केवल हित का टकराव न होकर नैतिक कदाचार और भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता। यह शोध की विश्वसनीयता को पूरी तरह समाप्त कर देता, क्योंकि तब उनका निर्णय वैज्ञानिक डेटा पर आधारित न होकर 'पुरस्कार' की प्रत्याशा पर आधारित होता। इसमें कंपनी और डॉक्टर के बीच एक सीधा अनुचित सौदा (Corrupt Deal) परिलक्षित होता।

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