Question 1(a) · 10 marks · 169 words written
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महात्मा गांधी के अनुसार पूंजी बुरी नहीं बल्कि उसका उपयोग बुरा या गलत होता है। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में किसी न किसी रूप में पूंजी की आवश्यकता होती है।
Body · continuous prose
वहीं पूंजीवादी विचारधारा राज्य के अहस्तक्षेप को मानती है तथा व्यक्ति के चयन की स्वतंत्रता को बढ़ावा देती है। समाज की बजाय व्यक्ति को मूल मानती है।
असीमित सम्पत्ति का यह तर्क डार्विनवादी अवधारणा को समाज में लागू करने का नाम है। जो एक विशेषाधिकार
वाले वर्ग का निर्माण करेगा। (प्रतिस्पर्धा में एक ही विजेता बनता है)
इस असीमित सम्पति के तर्क को दो शेरों के एक छोरो पर कब्जे के रूप में देखा जा सकता है।
यह अवधारणा सहयोग की बजाय संघर्ष तथा परोपकार की बजाय स्वहित को केन्द्र मानती है।
वैश्वीकृत विश्व में इसे कुछ विकसित राष्ट्रों द्वारा वैक्सीन आपूर्ति में राष्ट्रवादिता एवं बौद्धिक अधिकार प्रणाली में वेग न देने के रूप में देख सकते हैं।
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अतः यह पूंजीवाद नैतिकता स्वये भलाई को महत्व देता है जो कि लोकसेवा में भ्रष्टाचार को बढ़ावा भी दे सकता है।