AIR 12 · CSE 2019 · GS4 · 63 pages

Ajay Jain: GS4 answer copy

19 answers by Ajay Jain, as written in the test. Each question opens a page with how other toppers answered it.

The questions

  1. Q11. क्या इस अध्ययन में डॉ. सिंह की भागीदारी उचित है? अपना औचित्य सिद्ध कीजिए। 2. क्या डॉ. सिंह हितों के टकराव से जुड़े हैं? यदि हां, तो ऐसे टकराव की प्रकृति क्या है? इसका शमन कैसे किया जा सकता है। 3. यदि उनके नाम पहले से ही शेयर नहीं होते तथा उक्त अध्ययन के संचालन के एवज में शेयर का प्रस्ताव किया गया होता तो हितों के टकराव की प्रकृति किस प्रकार अलग होती?
  2. Q21. क्या इस अध्ययन में डॉ. सिंह की भागीदारी उचित है? अपना औचित्य सिद्ध कीजिए। 2. क्या डॉ. सिंह हितों के टकराव से जुड़े हैं? यदि हां, तो ऐसे टकराव की प्रकृति क्या है? इसका शमन कैसे किया जा सकता है। 3. यदि उनके नाम पहले से ही शेयर नहीं होते तथा उक्त अध्ययन के संचालन के एवज में शेयर का प्रस्ताव किया गया होता तो हितों के टकराव की प्रकृति किस प्रकार अलग होती?
  3. Q31. क्या इस अध्ययन में डॉ. सिंह की भागीदारी उचित है? अपना औचित्य सिद्ध कीजिए। 2. क्या डॉ. सिंह हितों के टकराव से जुड़े हैं? यदि हां, तो ऐसे टकराव की प्रकृति क्या है? इसका शमन कैसे किया जा सकता है। 3. यदि उनके नाम पहले से ही शेयर नहीं होते तथा उक्त अध्ययन के संचालन के एवज में शेयर का प्रस्ताव किया गया होता तो हितों के टकराव की प्रकृति किस प्रकार अलग होती?

The answers

Question 1 · 302 words written

1. क्या इस अध्ययन में डॉ. सिंह की भागीदारी उचित है? अपना औचित्य सिद्ध कीजिए। 2. क्या डॉ. सिंह हितों के टकराव से जुड़े हैं? यदि हां, तो ऐसे टकराव की प्रकृति क्या है? इसका शमन कैसे किया जा सकता है। 3. यदि उनके नाम पहले से ही शेयर नहीं होते तथा उक्त अध्ययन के संचालन के एवज में शेयर का प्रस्ताव किया गया होता तो हितों के टकराव की प्रकृति किस प्रकार अलग होती?

Opening

इस मामले में डॉ. सिंह की भागीदारी कई नैतिक और पेशेवर चिंताओं को जन्म देती है, जिसका विश्लेषण निम्न प्रकार है:

Body · points

  1. डॉ. सिंह की भागीदारी का औचित्य:

    • डॉ. सिंह की भागीदारी पूरी तरह अनुचित प्रतीत होती है क्योंकि यह 'स्वार्थ के टकराव' (Conflict of Interest) का स्पष्ट मामला है।
    • एक प्रमुख अन्वेषक (Principal Investigator) के रूप में उनकी भूमिका निष्पक्ष होनी चाहिए, लेकिन कंपनी द्वारा दी जा रही वित्तीय प्रोत्साहन राशि और संभावित प्रसिद्धि उनके निर्णयों को प्रभावित कर सकती है।
    • इससे अध्ययन की विश्वसनीयता और वस्तुनिष्ठता खतरे में पड़ जाती है।
  2. हितों के टकराव की प्रकृति और शमन:

    • प्रकृति: यह एक 'वित्तीय और पेशेवर हितों का टकराव' है। कंपनी का लाभ सीधे डॉ. सिंह के व्यक्तिगत वित्तीय लाभ (शेयरों के माध्यम से) और करियर की प्रगति (प्रसिद्धि) से जुड़ा है।
    • शमन (Mitigation):
      • प्रकटीकरण (Disclosure): डॉ. सिंह को तुरंत सभी संबंधित पक्षों के समक्ष अपने वित्तीय हितों का खुलासा करना चाहिए।
      • पद से हटना: उन्हें या तो अध्ययन के प्रमुख अन्वेषक का पद छोड़ देना चाहिए या शेयरों का स्वामित्व त्यागना चाहिए।
      • स्वतंत्र निगरानी: अध्ययन की निगरानी एक स्वतंत्र समिति द्वारा की जानी चाहिए ताकि डेटा के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ न हो सके।
  3. हितों के टकराव की भिन्न प्रकृति:

    • यदि शेयर पहले से नहीं होते और अध्ययन के संचालन के बदले में शेयरों का प्रस्ताव किया जाता, तो यह एक 'नैतिक भ्रष्टाचार' (Quid Pro Quo) की श्रेणी में आता।
    • इसमें 'लालच' का तत्व अधिक प्रभावी होता, जहाँ अध्ययन के परिणामों को सकारात्मक दिखाने के लिए एक स्पष्ट 'इनाम' की घोषणा की गई है।
    • पहले वाले मामले में हितों का टकराव पूर्व-अस्तित्व में था, जबकि इस नए परिदृश्य में यह सीधे तौर पर अध्ययन की प्रक्रिया को रिश्वत के माध्यम से प्रभावित करने का प्रयास होता।

Close · no separate close

None written.