Question 1(a) · 10 marks · 198 words written
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आत्म-प्रभावकारिता से तात्पर्य, जब कोई व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण या अधिक से अधिक आंतरिक क्षमता के साथ कार्य करे।
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इसके प्रमुख निर्धारक व उनका महत्व
→ स्व-जागरूकता → व्यक्ति के अपने स्वयं की भावनाओं, अपनी क्षमताओं, कमियों आदि के बारे ज्ञान होना।
स्व-नियंत्रण → व्यक्ति को अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति व उनकी तीव्रता को प्रबंधित करने की क्षमता
स्व-अभिप्रेरणा → व्यक्ति के पास ऐसी क्षमता होने कि वह बाह्य नकारात्मक परिस्थितियों में भी स्वयं को प्रेरित रख सके।
सामाजिक दक्षता → ऐसी क्षमता जिससे व्यक्ति और लोगों के साथ संबंध बना सके।
एक सिविल सेवक के लिए उच्च आत्म-प्रभावकारिता का महत्व
(1) सिविल सेवकों को अत्यधिक दबाव में कार्य करना पड़ता है, अतः उनमें ऐसी क्षमताओं का होना आवश्यक है, जिससे वह अपनी भावनाओं को प्रबंधित कर सके, जैसे आई.पी.एस. सुरेंद्र दास द्वारा आत्महत्या करना।
(2) सिविल सेवकों को देश के कल्याणकारी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए, जनता व अपने विभाग के अधिकारियों से स्वस्थ संबंध बनाना पड़ता है, जैसे महाराष्ट्र कैडर के आई.पी.एस. विश्वास नांगरे पाटिल द्वारा बॉडी मास इंडेक्स का प्रयोग।
(3) सिविल सेवकों को भ्रष्टाचार से दूर रहने व ईमानदार व वस्तुनिष्ठ बने रहने के लिए स्व-नियंत्रण आवश्यक है, जैसे एस. आर. संकरण जी का चरित्र।
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