Ritika ChitlangiaAIR 55 · CSE 2024 · 271 wordsTheir whole copy
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इस मामले में जटिल प्रशासनिक और नैतिक मुद्दे शामिल हैं:
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(a) नैतिक मुद्दे और दुविधाएँ:
- विकास बनाम पर्यावरण: बुनियादी ढांचा विकास और पारिस्थितिक संरक्षण के बीच संतुलन।
- लोक कल्याण बनाम व्यक्तिगत अधिकार: ग्रामीण संपर्क के लाभ और किसानों की भूमि व आजीविका की सुरक्षा।
- जवाबदेही बनाम सामूहिक जिम्मेदारी: समन्वयक के रूप में सुश्री राव की जवाबदेही और अन्य विभागों की अक्षमता।
- व्यावसायिक दुविधा: उच्च अधिकारियों के दबाव और नीतिगत देरी के बीच कार्यक्षमता बनाए रखने की चुनौती।
(b) सुश्री राव के पास उपलब्ध विकल्प:
- विकल्प 1: तत्काल प्रभाव से प्रशासनिक सख्ती बढ़ाना और रिपोर्टिंग की नई प्रणाली लागू करना।
- विकल्प 2: मुख्य सचिव से व्यक्तिगत मिलकर बाधाओं को वस्तुनिष्ठ रिपोर्ट के साथ स्पष्ट करना।
- विकल्प 3: सभी संबंधित विभागों के साथ एक 'समन्वय समिति' का गठन करना ताकि जवाबदेही तय की जा सके।
(c) सुश्री राव के लिए सुझाव: मुझे लगता है कि उन्हें विकल्प 2 और 3 के संयोजन का उपयोग करना चाहिए।
- कारण: एक 'समन्वय कार्यबल' बनाकर वे अंतर-विभागीय मुद्दों को सीधे हल कर सकती हैं और पारदर्शिता ला सकती हैं। मुख्य सचिव के समक्ष तथ्यों पर आधारित रिपोर्ट प्रस्तुत करने से वे स्वयं को रक्षात्मक होने के बजाय सक्रिय प्रदर्शित कर पाएंगी।
(d) क्या जवाबदेही उचित थी? नहीं, पूरी तरह से उन्हें जवाबदेह ठहराना अनुचित था।
- कारण: यद्यपि जिला कलेक्टर के रूप में वे समन्वयक हैं, लेकिन विशिष्ट विभागों (पर्यावरण/कृषि/पीडब्ल्यूडी) की कार्यकुशलता उनके सीधे नियंत्रण में नहीं है। जवाबदेही का सिद्धांत यह है कि अधिकार और दायित्व समानुपाती होने चाहिए। ऐसे में, सिस्टम की विफलता के लिए केवल उन्हें बलि का बकरा बनाना प्रशासनिक मनोबल के लिए नकारात्मक है।
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